शनिवार, 10 सितंबर 2022

स्वरूप

मैं अपने ही स्वरूप को, एक दिन ज़रूर पाऊँगा 

चाहे मिथ्यात्व का साया, घनघोर भले ही छा जाये 
चाहे कैसी भी भीषण, विपरीत परिस्थिति आये 
मैं अपने पुरुषार्थ की, ज्योत सतत जगाऊँगा 
मैं अपने ही स्वरूप को, एक दिन ज़रूर पाऊँगा

चाहे वश मेरा समझने पर चले, या ना चले 
चाहे वश मेरा समझाने पर चले, या ना चले 
मैं समझने समझाने को भी, बस देखता जाऊँगा
मैं अपने ही स्वरूप को, एक दिन ज़रूर पाऊँगा

चाहे इस दिल की धड़कन, धीमी हो या तेज हो 
चाहे संग मेरे दुनिया या, हर नज़र को ही परहेज़ हो 
मैं मेरा जो मुझसे ही है, परहेज़ वो मिटाऊँगा 
मैं अपने ही स्वरूप को, एक दिन ज़रूर पाऊँगा

चाहे हर एक समय, कषायों ने आ घेरा हो 
चाहे गले में कर्त्तव्यों का, ही क्यों न फेरा हो 
मैं समय-समय सावधानी से, समय समय से मिलाऊँगा 
मैं अपने ही स्वरूप को, एक दिन ज़रूर पाऊँगा

चाहे मंदबुद्धि अल्पज्ञानी, दुनियादारी में ठहराऊँ 
चाहे किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो, सब जग हँसाई करवाऊँ 
योग्यता मैं ज्ञान की जो, ज्ञान में जनवाऊँगा 
मैं अपने ही स्वरूप को, एक दिन ज़रूर पाऊँगा

चाहे लड़खड़ायें कदम या, दिशा भले विपरीत हो 
चाहे कर्कश वाणी या फिर, मोहता संगीत हो 
सही दिशा में बार-बार मैं, कदम बढ़ाये जाऊँगा 
मैं अपने ही स्वरूप को, एक दिन ज़रूर पाऊँगा


तेरी बलिहारी है

रे कर्म तेरी बलिहारी है  शब्द को तू शूल कर दे  शूल को तू फूल कर दे  अद्भुत बड़ी तेरी कलाकारी है... रे कर्म सही गलत का भेद न जानें  जो मनवाये ...