रविवार, 9 मार्च 2025

तेरी बलिहारी है

रे कर्म

तेरी बलिहारी है 


शब्द को तू शूल कर दे 

शूल को तू फूल कर दे 

अद्भुत बड़ी तेरी कलाकारी है... रे कर्म


सही गलत का भेद न जानें 

जो मनवाये तू बस वही मानें 

प्रतिभा तो भरपूर है तुझमें 

क्या गज़ब सलाहकारी है... रे कर्म


चाह किसी की कहाँ चली है 

तेरी चाह ही बस पली है 

ठाठ तो बड़े हैं तेरे 

बस दासता हमारी है... रे कर्म


अब तक मुझे कहाँ तू जाना 

मेरा शौर्य कहाँ पहचाना

असला तो भरपूर पड़ा है 

बाँकी बस तैयारी है... रे कर्म


सोये शेर पे चींटी बैठे 

समझे सवार, मन ही मन ऐंठे 

तू भी बैठ ले ऐंठ के तब तक 

बस अँगड़ाई शेर ले जब तक 

तू भी भूल में बैठा

जैसे भूल चींटी की भारी है... रे कर्म  


हो जा

दो नावों से कैसे तिरेगा 

अब तो अपनी ओर हो जा 


नहीं ठिकाना कहीं जगत में 

अब तो अपनी ठोर हो जा 


पर भावों में ख़ाली पड़ा तू 

अब स्वभाव विभोर हो जा 


व्यर्थ जगत की लिखा पढ़ी सब 

अब तू कागज़ कोर हो जा 


दीनता में झुका पड़ा क्यूँ 

अब अपना सिरमौर हो जा 


शीतल धवल सा चाँद है तू ही 

अब तो अपना चकोर हो जा 


जाग ले ऐसा अन्तर में तू 

जग के लिये सदा को सो जा 

लीला है

देखता तू 

जानता तू 

और नहीं कुछ...लीला है 


करता तू 

करता नहीं पर 

स्याद्वाद है...लीला है 


भोगता तू 

भोगा नहीं पर 

भिन्न भोग है...लीला है 


देह तेरी पर 

देह नहीं तू 

देहातीत है...लीला है 


जग में तू 

जग नहीं तेरा

तेरा तुझमें सब...लीला है 


चारों 'त्व' 

तुझमें ही तुझसे 

बाहर तो सब...लीला है 

रविवार, 23 फ़रवरी 2025

दीप बुझता नहीं

घोर अन्धकार हो
चल रही बयार हो 
तीर गदा भाल सा 
कर्म का प्रहार हो 
भिन्न अति भिन्न जो 
रंच न हो खिन्न जो 
वज्र सा अभेद 
चैतन्य चमत्कार जो 
ज्ञान का प्रकाशमय
दीप बुझता नहीं 
जानता बस ज्ञानी 
नहीं जानता अज्ञान वो। 

विकल्प हो 
संकल्प हो 
अंत काल कल्प हो 
मनो वच काय की 
प्रवृत्ति बहु, अल्प हो 
तीन काल ही सही 
बदला न जो, बदले नहीं 
बंध से निर्बन्ध
नहीं धूल से सम्बन्ध
प्रचण्ड वायु वेग से भी 
दीप बुझता नहीं 
जानता बस ज्ञानी 
नहीं जानता अज्ञान वो।

रात हो 
सवेर हो 
जल्द हो या देर हो 
चार गतियों का 
क्रमबद्ध बड़ा घेर हो 
छोटा बड़ा घेर 
नहीं होता कोई फेर 
लहरों के ताण्डव से भी 
होता नहीं है ढेर जो
अचल अछूता वर 
ऐसा ज्ञान का सागर 
अनंत गुण धर्म 
उस एक का ही मर्म 
अनंत काल में भी वो 
दीप बुझता नहीं  
जानता बस ज्ञानी 
नहीं जानता अज्ञान वो।

उद्गार

रात का अंधेरा भी, दिन का सवेरा भी, जो तेरा संग है तो सब मंज़ूर है
नहीं गवारा कुछ भी तेरे बिन, न जाने तेरा मुझ पर कैसा ये सुरूर है
रोशन होता है पल जो मेरा, वजह बस तेरा ही नूर है
हुआ करती होगी जन्नत कहीं, मेरी तो बस एक तू ही हूर है 
ख़्वाहिश तेरी मेरी जुदा, बेशक होती कभी जरूर है
दिल तो धड़कते हैं साथ ही, जुदाई उनको कहाँ मंजूर है
रास्ता कभी आसान, कभी होती चढ़ाई जरूर है 
कभी खुली सड़क भी होती, सकरी पगडण्डी भरपूर है 
हाथ पकड़ चलते कभी, कभी कदम आगे पीछे जरूर है 
नहीं ये फ़ासला धड़कनों का, रास्ते का ही ये दस्तूर है 
चलते रहना है रास्ते पे, मंज़िल अभी तो बहुत दूर है 
पहुँचेंगे मंज़िल पर दोनों ही, ये विश्वास दिल में भरपूर है 
बदलता नहीं रास्ता ये, इस खेल में यही मशहूर है 
वही रास्ता, वही कदम, पर संग तेरे बढ़ती हिम्मत ज़रूर है 
नज़र भले रास्ते को देखे, ख़्याल तेरा दिल में भरपूर है 
जीवन साथी मिला तुझ सा जो, इस बात का मुझे तो गुरूर है 
चाहत दिखती, कभी दिख न पाती, पर चाहत तेरी मुझको भरपूर है 

मंगलवार, 1 नवंबर 2022

खो गया हूँ

चले थे कुछ दूर कदम उस ओर 
जाने क्यूँ इस ओर हो गया हूँ 
स्याह सुर्ख़ से अँधेरे में, फिर एक बार क्यूँ खो गया हूँ 

दिखी थी कुछ रोशनी, मिली थी कुछ दिशा भी 
नहीं डरा पा रही थी तब, गहरी काली सी निशा भी
मन में उमड़ा था विश्वास, जागी थी दिल में एक आस
अँधेरों में छुपी वो मंज़िल, लगने लगी थी कुछ कुछ पास 
ठोकर जो लगी, नज़र सी हटी
नज़र में फिर स्याह अँधियारा है
दिखती नहीं वो रोशनी अब
धुँधला गयी जिसकी याद भी अब 
जागने वाला था, शायद कुछ पल में 
नींद में गहरा, फिर क्यूँ सो गया हूँ 
स्याह सुर्ख़ से अँधेरे में, फिर एक बार क्यूँ खो गया हूँ 

उमंग थी, तरंग थी 
उड़ने को ही बस पतंग थी 
निराश अब, हताश अब
कटी पतंग, नहीं परवाज़ अब 
कोशिश थी कुछ, होश में आने की 
बेहोश जड़ सा, फिर क्यूँ हो गया हूँ 
स्याह सुर्ख़ से अँधेरे में, फिर एक बार क्यूँ खो गया हूँ 

क्या वो रोशनी फिर मिलेगी?
क्या वो कली फिर से खिलेगी?
मिली तो क्या, फिर ठोकर खाऊँगा?
डगमगाकर क्या, फिर से सम्हल पाऊँगा?
कितना दुर्लभ है रास्ता पाना 
और भी दुर्लभ सम्हलते जाना 
चिकनी सड़क पे, पहला ही तो कदम था 
ठाना था मैंने, पर क्षणिक वो दम था 
दम का दम झट से यूँ निकला 
पग रखते से ही पग फिसला 
पहले ही कदम में, बेदम सा हो गया फिर 
जहाँ जैसा था सदा, वैसा ही हो गया फिर
अपने ही रास्ते में काँटे, फिर क्यूँ बो गया हूँ 
स्याह सुर्ख़ से अँधेरे में, फिर एक बार क्यूँ खो गया हूँ
 

  
 

शनिवार, 10 सितंबर 2022

स्वरूप

मैं अपने ही स्वरूप को, एक दिन ज़रूर पाऊँगा 

चाहे मिथ्यात्व का साया, घनघोर भले ही छा जाये 
चाहे कैसी भी भीषण, विपरीत परिस्थिति आये 
मैं अपने पुरुषार्थ की, ज्योत सतत जगाऊँगा 
मैं अपने ही स्वरूप को, एक दिन ज़रूर पाऊँगा

चाहे वश मेरा समझने पर चले, या ना चले 
चाहे वश मेरा समझाने पर चले, या ना चले 
मैं समझने समझाने को भी, बस देखता जाऊँगा
मैं अपने ही स्वरूप को, एक दिन ज़रूर पाऊँगा

चाहे इस दिल की धड़कन, धीमी हो या तेज हो 
चाहे संग मेरे दुनिया या, हर नज़र को ही परहेज़ हो 
मैं मेरा जो मुझसे ही है, परहेज़ वो मिटाऊँगा 
मैं अपने ही स्वरूप को, एक दिन ज़रूर पाऊँगा

चाहे हर एक समय, कषायों ने आ घेरा हो 
चाहे गले में कर्त्तव्यों का, ही क्यों न फेरा हो 
मैं समय-समय सावधानी से, समय समय से मिलाऊँगा 
मैं अपने ही स्वरूप को, एक दिन ज़रूर पाऊँगा

चाहे मंदबुद्धि अल्पज्ञानी, दुनियादारी में ठहराऊँ 
चाहे किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो, सब जग हँसाई करवाऊँ 
योग्यता मैं ज्ञान की जो, ज्ञान में जनवाऊँगा 
मैं अपने ही स्वरूप को, एक दिन ज़रूर पाऊँगा

चाहे लड़खड़ायें कदम या, दिशा भले विपरीत हो 
चाहे कर्कश वाणी या फिर, मोहता संगीत हो 
सही दिशा में बार-बार मैं, कदम बढ़ाये जाऊँगा 
मैं अपने ही स्वरूप को, एक दिन ज़रूर पाऊँगा


तेरी बलिहारी है

रे कर्म तेरी बलिहारी है  शब्द को तू शूल कर दे  शूल को तू फूल कर दे  अद्भुत बड़ी तेरी कलाकारी है... रे कर्म सही गलत का भेद न जानें  जो मनवाये ...