रविवार, 23 फ़रवरी 2025

उद्गार

रात का अंधेरा भी, दिन का सवेरा भी, जो तेरा संग है तो सब मंज़ूर है
नहीं गवारा कुछ भी तेरे बिन, न जाने तेरा मुझ पर कैसा ये सुरूर है
रोशन होता है पल जो मेरा, वजह बस तेरा ही नूर है
हुआ करती होगी जन्नत कहीं, मेरी तो बस एक तू ही हूर है 
ख़्वाहिश तेरी मेरी जुदा, बेशक होती कभी जरूर है
दिल तो धड़कते हैं साथ ही, जुदाई उनको कहाँ मंजूर है
रास्ता कभी आसान, कभी होती चढ़ाई जरूर है 
कभी खुली सड़क भी होती, सकरी पगडण्डी भरपूर है 
हाथ पकड़ चलते कभी, कभी कदम आगे पीछे जरूर है 
नहीं ये फ़ासला धड़कनों का, रास्ते का ही ये दस्तूर है 
चलते रहना है रास्ते पे, मंज़िल अभी तो बहुत दूर है 
पहुँचेंगे मंज़िल पर दोनों ही, ये विश्वास दिल में भरपूर है 
बदलता नहीं रास्ता ये, इस खेल में यही मशहूर है 
वही रास्ता, वही कदम, पर संग तेरे बढ़ती हिम्मत ज़रूर है 
नज़र भले रास्ते को देखे, ख़्याल तेरा दिल में भरपूर है 
जीवन साथी मिला तुझ सा जो, इस बात का मुझे तो गुरूर है 
चाहत दिखती, कभी दिख न पाती, पर चाहत तेरी मुझको भरपूर है 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

तेरी बलिहारी है

रे कर्म तेरी बलिहारी है  शब्द को तू शूल कर दे  शूल को तू फूल कर दे  अद्भुत बड़ी तेरी कलाकारी है... रे कर्म सही गलत का भेद न जानें  जो मनवाये ...