रे कर्म
तेरी बलिहारी है
शब्द को तू शूल कर दे
शूल को तू फूल कर दे
अद्भुत बड़ी तेरी कलाकारी है... रे कर्म
सही गलत का भेद न जानें
जो मनवाये तू बस वही मानें
प्रतिभा तो भरपूर है तुझमें
क्या गज़ब सलाहकारी है... रे कर्म
चाह किसी की कहाँ चली है
तेरी चाह ही बस पली है
ठाठ तो बड़े हैं तेरे
बस दासता हमारी है... रे कर्म
अब तक मुझे कहाँ तू जाना
मेरा शौर्य कहाँ पहचाना
असला तो भरपूर पड़ा है
बाँकी बस तैयारी है... रे कर्म
सोये शेर पे चींटी बैठे
समझे सवार, मन ही मन ऐंठे
तू भी बैठ ले ऐंठ के तब तक
बस अँगड़ाई शेर ले जब तक
तू भी भूल में बैठा
जैसे भूल चींटी की भारी है... रे कर्म
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