रविवार, 9 मार्च 2025

हो जा

दो नावों से कैसे तिरेगा 

अब तो अपनी ओर हो जा 


नहीं ठिकाना कहीं जगत में 

अब तो अपनी ठोर हो जा 


पर भावों में ख़ाली पड़ा तू 

अब स्वभाव विभोर हो जा 


व्यर्थ जगत की लिखा पढ़ी सब 

अब तू कागज़ कोर हो जा 


दीनता में झुका पड़ा क्यूँ 

अब अपना सिरमौर हो जा 


शीतल धवल सा चाँद है तू ही 

अब तो अपना चकोर हो जा 


जाग ले ऐसा अन्तर में तू 

जग के लिये सदा को सो जा 

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