दो नावों से कैसे तिरेगा
अब तो अपनी ओर हो जा
नहीं ठिकाना कहीं जगत में
अब तो अपनी ठोर हो जा
पर भावों में ख़ाली पड़ा तू
अब स्वभाव विभोर हो जा
व्यर्थ जगत की लिखा पढ़ी सब
अब तू कागज़ कोर हो जा
दीनता में झुका पड़ा क्यूँ
अब अपना सिरमौर हो जा
शीतल धवल सा चाँद है तू ही
अब तो अपना चकोर हो जा
जाग ले ऐसा अन्तर में तू
जग के लिये सदा को सो जा
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