रविवार, 23 फ़रवरी 2025

दीप बुझता नहीं

घोर अन्धकार हो
चल रही बयार हो 
तीर गदा भाल सा 
कर्म का प्रहार हो 
भिन्न अति भिन्न जो 
रंच न हो खिन्न जो 
वज्र सा अभेद 
चैतन्य चमत्कार जो 
ज्ञान का प्रकाशमय
दीप बुझता नहीं 
जानता बस ज्ञानी 
नहीं जानता अज्ञान वो। 

विकल्प हो 
संकल्प हो 
अंत काल कल्प हो 
मनो वच काय की 
प्रवृत्ति बहु, अल्प हो 
तीन काल ही सही 
बदला न जो, बदले नहीं 
बंध से निर्बन्ध
नहीं धूल से सम्बन्ध
प्रचण्ड वायु वेग से भी 
दीप बुझता नहीं 
जानता बस ज्ञानी 
नहीं जानता अज्ञान वो।

रात हो 
सवेर हो 
जल्द हो या देर हो 
चार गतियों का 
क्रमबद्ध बड़ा घेर हो 
छोटा बड़ा घेर 
नहीं होता कोई फेर 
लहरों के ताण्डव से भी 
होता नहीं है ढेर जो
अचल अछूता वर 
ऐसा ज्ञान का सागर 
अनंत गुण धर्म 
उस एक का ही मर्म 
अनंत काल में भी वो 
दीप बुझता नहीं  
जानता बस ज्ञानी 
नहीं जानता अज्ञान वो।

उद्गार

रात का अंधेरा भी, दिन का सवेरा भी, जो तेरा संग है तो सब मंज़ूर है
नहीं गवारा कुछ भी तेरे बिन, न जाने तेरा मुझ पर कैसा ये सुरूर है
रोशन होता है पल जो मेरा, वजह बस तेरा ही नूर है
हुआ करती होगी जन्नत कहीं, मेरी तो बस एक तू ही हूर है 
ख़्वाहिश तेरी मेरी जुदा, बेशक होती कभी जरूर है
दिल तो धड़कते हैं साथ ही, जुदाई उनको कहाँ मंजूर है
रास्ता कभी आसान, कभी होती चढ़ाई जरूर है 
कभी खुली सड़क भी होती, सकरी पगडण्डी भरपूर है 
हाथ पकड़ चलते कभी, कभी कदम आगे पीछे जरूर है 
नहीं ये फ़ासला धड़कनों का, रास्ते का ही ये दस्तूर है 
चलते रहना है रास्ते पे, मंज़िल अभी तो बहुत दूर है 
पहुँचेंगे मंज़िल पर दोनों ही, ये विश्वास दिल में भरपूर है 
बदलता नहीं रास्ता ये, इस खेल में यही मशहूर है 
वही रास्ता, वही कदम, पर संग तेरे बढ़ती हिम्मत ज़रूर है 
नज़र भले रास्ते को देखे, ख़्याल तेरा दिल में भरपूर है 
जीवन साथी मिला तुझ सा जो, इस बात का मुझे तो गुरूर है 
चाहत दिखती, कभी दिख न पाती, पर चाहत तेरी मुझको भरपूर है 

तेरी बलिहारी है

रे कर्म तेरी बलिहारी है  शब्द को तू शूल कर दे  शूल को तू फूल कर दे  अद्भुत बड़ी तेरी कलाकारी है... रे कर्म सही गलत का भेद न जानें  जो मनवाये ...