मंगलवार, 1 नवंबर 2022

खो गया हूँ

चले थे कुछ दूर कदम उस ओर 
जाने क्यूँ इस ओर हो गया हूँ 
स्याह सुर्ख़ से अँधेरे में, फिर एक बार क्यूँ खो गया हूँ 

दिखी थी कुछ रोशनी, मिली थी कुछ दिशा भी 
नहीं डरा पा रही थी तब, गहरी काली सी निशा भी
मन में उमड़ा था विश्वास, जागी थी दिल में एक आस
अँधेरों में छुपी वो मंज़िल, लगने लगी थी कुछ कुछ पास 
ठोकर जो लगी, नज़र सी हटी
नज़र में फिर स्याह अँधियारा है
दिखती नहीं वो रोशनी अब
धुँधला गयी जिसकी याद भी अब 
जागने वाला था, शायद कुछ पल में 
नींद में गहरा, फिर क्यूँ सो गया हूँ 
स्याह सुर्ख़ से अँधेरे में, फिर एक बार क्यूँ खो गया हूँ 

उमंग थी, तरंग थी 
उड़ने को ही बस पतंग थी 
निराश अब, हताश अब
कटी पतंग, नहीं परवाज़ अब 
कोशिश थी कुछ, होश में आने की 
बेहोश जड़ सा, फिर क्यूँ हो गया हूँ 
स्याह सुर्ख़ से अँधेरे में, फिर एक बार क्यूँ खो गया हूँ 

क्या वो रोशनी फिर मिलेगी?
क्या वो कली फिर से खिलेगी?
मिली तो क्या, फिर ठोकर खाऊँगा?
डगमगाकर क्या, फिर से सम्हल पाऊँगा?
कितना दुर्लभ है रास्ता पाना 
और भी दुर्लभ सम्हलते जाना 
चिकनी सड़क पे, पहला ही तो कदम था 
ठाना था मैंने, पर क्षणिक वो दम था 
दम का दम झट से यूँ निकला 
पग रखते से ही पग फिसला 
पहले ही कदम में, बेदम सा हो गया फिर 
जहाँ जैसा था सदा, वैसा ही हो गया फिर
अपने ही रास्ते में काँटे, फिर क्यूँ बो गया हूँ 
स्याह सुर्ख़ से अँधेरे में, फिर एक बार क्यूँ खो गया हूँ
 

  
 

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